धर्मनिरपेक्षता भारतीय संस्कृति का मूल नहीं, संविधान से ‘समाजवाद’ और ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द हटाने पर हो विचार : शिवराज सिंह

Varanasi News:  केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक बार फिर भारतीय संविधान में आपातकाल के दौरान जोड़े गए ‘धर्मनिरपेक्षता’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्दों को हटाने की आवश्यकता पर बल दिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति सर्वधर्म समभाव पर आधारित है, जो सभी धर्मों का सम्मान करना सिखाती है। ऐसे में ‘धर्मनिरपेक्षता’ जैसे शब्द की जरूरत संविधान में नहीं है।

वाराणसी में मीडिया से बातचीत में उन्होंने कहा, “भारत का मूल भाव ‘सर्वधर्म सद्भाव’ है। यह देश प्राचीन काल से ही कहता आया है कि सत्य एक है, विद्वान उसे अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। हमारी संस्कृति उपासना की विविधता को सम्मान देती है। ऐसे में ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द को संविधान से हटाने पर विचार होना चाहिए, क्योंकि यह हमारी सांस्कृतिक आत्मा से मेल नहीं खाता।”

समाजवाद भारतीय भाव का हिस्सा, लेकिन शब्द की जरूरत नहीं

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि ‘समाजवाद’ का भाव भारत के मूल विचारों में पहले से मौजूद है। उन्होंने श्लोकों और प्राचीन ग्रंथों का हवाला देते हुए कहा कि ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’, ‘अयं निजः परो वेति’ जैसे विचार यह बताते हैं कि भारत सबको समान मानता है। उन्होंने कहा, “हमारे यहां ‘सियाराम मय सब जग जानी’ की भावना है। इसलिए ‘समाजवाद’ शब्द जोड़ने की कोई आवश्यकता नहीं थी।”

आपातकाल को बताया लोकतंत्र का काला अध्याय

शिवराज सिंह चौहान ने आपातकाल के 50 साल पूरे होने पर उस समय को याद किया और बताया कि किस तरह लोकतांत्रिक अधिकारों को कुचला गया था। उन्होंने कहा, “मैं उस समय 16 साल का था और स्कूल में पढ़ता था। आपातकाल के खिलाफ पर्चियां बांटने के कारण मुझे भी पुलिस ने पकड़ लिया और भोपाल सेंट्रल जेल में डाल दिया।” उन्होंने आपातकाल को भारतीय लोकतंत्र का सबसे काला अध्याय बताया और कहा कि यह समय संविधान में हुए बदलावों को खत्म करने पर मंथन का है।

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